सोने-चांदी की चमक, कर व्यवस्था और आम जनता की चिंत
पवन गुप्ता (सम्पादक )
देश में सोने और चांदी की कीमतें लगातार तेज़ी से बढ़ रही हैं। कभी आम परिवार की बचत और परंपरा का हिस्सा रहीं ये कीमती धातुएं अब धीरे-धीरे आम जनता की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं। शादियों और त्योहारों में जरूरी माने जाने वाले आभूषण अब मध्यम वर्ग के लिए सपना बनते जा रहे हैं।
एक ओर जहां सरकार ने लगभग हर वस्तु और सेवा को जीएसटी के दायरे में ला दिया है, वहीं सोने-चांदी से जुड़े कर प्रावधानों को लेकर सवाल लगातार उठते रहे हैं। खासतौर पर ई-वे बिल को लेकर स्थिति आम लोगों के लिए चौंकाने वाली है।
फैक्ट चेक
वर्तमान में सोने-चांदी और ज्वेलरी के परिवहन पर ई-वे बिल अनिवार्य नहीं है। जीएसटी नियमों के तहत आभूषणों को ई-वे बिल से छूट दी गई है। सरकार का तर्क है कि ज्वेलरी का कारोबार संवेदनशील है और ई-वे बिल अनिवार्य करने से सुरक्षा जोखिम और व्यावहारिक दिक्कतें बढ़ सकती हैं।
हालांकि, यही छूट सवालों के घेरे में भी है। जब देश में अनाज, कपड़ा, मशीनरी और यहां तक कि छोटे व्यापारियों के सामान तक पर ई-वे बिल लागू है, तो करोड़ों रुपये के सोने-चांदी के परिवहन पर यह व्यवस्था क्यों नहीं है—यह प्रश्न आम जनता के मन में उठना स्वाभाविक है।
आलोचकों का मानना है कि ई-वे बिल की अनिवार्यता न होने से पारदर्शिता प्रभावित होती है और कालाधन व टैक्स चोरी की आशंकाएं भी बनी रहती हैं। वहीं बढ़ती कीमतों का सीधा असर आम खरीदार पर पड़ रहा है, जबकि बड़े कारोबारी और निवेशक अपेक्षाकृत सुरक्षित बने हुए हैं।
जरूरत इस बात की है कि सरकार सोने-चांदी से जुड़ी कर व्यवस्था पर पुनर्विचार करे। ऐसी नीति बनाई जाए जो सुरक्षा, पारदर्शिता और राजस्व—तीनों के बीच संतुलन बनाए।
अन्यथा सोने-चांदी की यह चमक आम आदमी के जीवन से पूरी तरह दूर होती चली जाएगी।
