महाशिवरात्रि रविवार को
आध्यात्मिक जागरण की रात्रि है महाशिवरात्रि : स्वामी पूर्णानंदपुरी जी महाराज

अलीगढ़। फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी और चतुर्दशी तिथि को श्रद्धा, भक्ति और तप के साथ मनाया जाने वाला महापर्व महाशिवरात्रि इस वर्ष 15 फरवरी, रविवार को मनाया जाएगा। महाशिवरात्रि केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आत्मजागरण का अवसर है। भगवान शिव संहार के देवता ही नहीं, बल्कि करुणा, सरलता और समता के प्रतीक हैं। वे हमें अहंकार त्यागकर सत्य, संयम और साधना के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य मिलन का प्रतीक माना जाता है तथा इसे आध्यात्मिक जागरण की रात्रि भी कहा जाता है।
वैदिक ज्योतिष संस्थान के प्रमुख स्वामी श्री पूर्णानंदपुरी जी महाराज ने बताया कि इस बार महाशिवरात्रि अत्यंत दुर्लभ और शुभ संयोग में आ रही है। इस दिन सूर्य, बुध, शुक्र और राहु कुंभ राशि में, केतु सिंह राशि में तथा चंद्रमा मकर राशि में गोचर करेंगे। साथ ही त्रिकोण योग और सर्वार्थ सिद्धि योग का विशेष संयोग बन रहा है। ज्योतिष शास्त्र में इन योगों को अत्यंत मंगलकारी और फलदायी माना जाता है। बताया गया कि ऐसा संयोग वर्ष 2007 में बना था और लगभग 19 वर्ष बाद पुनः बन रहा है, जिससे इस बार की शिवरात्रि का महत्व और भी बढ़ गया है।
स्वामी पूर्णानंदपुरी जी महाराज ने शिवपुराण की कोटिरुद्रसंहिता का उल्लेख करते हुए बताया कि भगवान शिव स्वयं कहते हैं कि जो व्यक्ति श्रद्धा और नियमपूर्वक शिवरात्रि का व्रत करता है, उसे भोग और मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है। ब्रह्मा, विष्णु और माता पार्वती के प्रश्न करने पर भगवान सदाशिव ने इस व्रत को अत्यंत पुण्यदायी बताया है। शास्त्रों के अनुसार इस रात्रि में भगवान शिव लिंग रूप में प्रकट हुए थे, इसी कारण इस दिन रात्रि जागरण और शिवलिंग पूजन का विशेष महत्व है। यह रात्रि आत्मशुद्धि, तप, संयम और ध्यान की रात्रि मानी जाती है।
सभी आध्यात्मिक अनुष्ठानों में उपवास को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। गीता में कहा गया है विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः” अर्थात उपवास से इंद्रियों की विषयों से निवृत्ति होती है। उपवास केवल भोजन का त्याग नहीं, बल्कि मन, वाणी और कर्म की शुद्धि का भी माध्यम है। जो साधक इस दिन संयम रखकर रात्रि जागरण करता है, वह अपने जीवन के लक्ष्य की प्राप्ति हेतु अधिक सक्षम बनता है। शिवरात्रि का व्रत आत्मनियंत्रण और आध्यात्मिक उन्नति का साधन है।
स्वामी जी के अनुसार महाशिवरात्रि पर प्रदोष काल से लेकर मध्यरात्रि तथा ब्रह्ममुहूर्त तक चार प्रहर की पूजा का विशेष महत्व है। प्रत्येक प्रहर में शिवलिंग का अभिषेक भिन्न-भिन्न सामग्री से किया जाता है। प्रथम प्रहर में जल और गंगाजल से अभिषेक किया जाता है। द्वितीय प्रहर में दूध से, तृतीय प्रहर में दही, घी और शहद से तथा चतुर्थ प्रहर में शुद्ध जल एवं बेलपत्र अर्पित किए जाते हैं। इसके अतिरिक्त बिल्वपत्र, धतूरा, आक के पुष्प, भस्म, चंदन, अक्षत, फल और मिष्ठान अर्पित किए जाते हैं।
