- संस्कारों की ‘अर्चना’: वैदिक संस्कृति के पुनरुद्धार की मशाल थामे डॉ. प्रिय
आर्य
हाथरस। आज के भौतिकतावादी युग में जहाँ परिवार बिखर रहे हैं और युवा पीढ़ी अपनी जड़ों से कट रही है, वहीं मथुरा की एक बेटी ने ‘वैचारिक क्रांति’ का शंखनाद कर समाज को नई दिशा दिखाई है। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर डॉ. अर्चना प्रिय आर्य की कहानी किसी प्रेरणापुंज से कम नहीं है।
टीस से जन्म लिया संकल्प ने
समाज में बढ़ते कुसंस्कारों, नशे की चपेट में आते बचपन और दर-दर भटकते वृद्धों की पीड़ा ने डॉ. अर्चना के मन में एक टीस पैदा की। उन्होंने महसूस किया कि इन सभी समस्याओं का एकमात्र समाधान ‘सनातन वैदिक संस्कारों’ की वापसी है। इसी उद्देश्य के साथ उन्होंने ‘संस्कार जागृति मिशन’ की स्थापना की।
दशक का संघर्ष और अटूट निष्ठा
जनपद हाथरस के गांव ऊंचागांव (सादाबाद) में जन्मी डॉ. अर्चना के इस सफर की शुरुआत मात्र 10 वर्ष की अल्पायु में ही हो गई थी। महर्षि दयानंद सरस्वती की विचारधारा और पिता आचार्य सत्यप्रिय आर्य प्रधान एवं माता सरोज रानी आर्य के प्रोत्साहन ने उन्हें वह संबल दिया, जिसकी बदौलत आज वे आर्य समाज की वरिष्ठ प्रचारकों में गिनी जाती हैं। तीन वर्षों के गहन शोध के बाद उन्होंने संस्कारों की पुनर्स्थापना को अपना जीवन ध्येय बना लिया।
विद्वत्ता और सामाजिक सेवा का संगम
डॉ. अर्चना ने न केवल सामाजिक मोर्चे पर बल्कि अकादमिक क्षेत्र में भी लोहा मनवाया है:
शैक्षिक उपलब्धि: देववाणी संस्कृत में पीएचडी (PhD) की उपाधि प्राप्त की।
प्रदेश में कीर्तिमान: उत्तर प्रदेश असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती परीक्षा में पूरे प्रदेश में 5वाँ स्थान प्राप्त कर मथुरा का मान बढ़ाया।
वर्तमान पद: वर्तमान में वे मेरठ के कनोहर लाल स्नातकोत्तर महिला महाविद्यालय में संस्कृत विभागाध्यक्ष के रूप में युवा पीढ़ी को शिक्षित कर रही हैं।
बदलाव की ओजस्वी गूँज
अपनी ओजस्वी वाणी से डॉ. अर्चना जब वैदिक संस्कृति का आह्वान करती हैं, तो श्रोता आत्मचिंतन के लिए विवश हो जाते हैं। आज उनकी इस मुहिम से प्रभावित होकर न केवल परिवार सुधर रहे हैं, बल्कि अनेक युवतियाँ भी इस जन-जागरण अभियान की ध्वजवाहक बन रही हैं।
डॉ. अर्चना प्रिय आर्य का जीवन इस बात का प्रमाण है कि यदि संकल्प दृढ़ हो और उद्देश्य पवित्र, तो एक अकेली मशाल भी समाज के अंधेरे को दूर करने का सामर्थ्य रखती है।
